📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
🔹 अध्याय 1 का परिचय:
श्रीमद्भगवद्गीता का पहला अध्याय "अर्जुन विषाद योग" कहलाता है। यह अध्याय कुरुक्षेत्र युद्ध के आरंभिक दृश्य को प्रस्तुत करता है, जहाँ अर्जुन युद्धभूमि में अपने रिश्तेदारों, गुरुओं और मित्रों को सामने खड़ा देख कर मानसिक रूप से विचलित हो जाता है।
🔹 अध्याय 1 में कुल श्लोक:
इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं।
🔹 इस अध्याय में क्या होता है?
- धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि युद्धभूमि में उनके और पांडवों के पुत्रों ने क्या किया।
- संजय बताता है कि दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार हैं और सेनानायकों के नाम गिनवाता है।
- शंखनाद द्वारा युद्ध की शुरुआत होती है।
- अर्जुन श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने को कहता है।
- अर्जुन अपने परिजनों को देखकर भावुक हो जाता है और युद्ध करने से पीछे हटने लगता है।
- वह अपना गांडीव (धनुष) नीचे रखकर बैठ जाता है और युद्ध से इंकार कर देता है।
🔹 अध्याय 1 का सार (भावार्थ):
यह अध्याय मनुष्य की मानसिक पीड़ा, मोह और कर्तव्य के द्वंद्व को दर्शाता है। अर्जुन का विषाद (दुःख) दर्शाता है कि जब जीवन में कठिन निर्णय आते हैं, तो केवल बाह्य शक्ति नहीं, अपितु आत्मिक संतुलन और सही ज्ञान भी आवश्यक होता है। इस स्थिति में श्रीकृष्ण मार्गदर्शक रूप में आगे आते हैं।
🔹 यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?
अर्जुन विषाद योग न केवल युद्धभूमि की पृष्ठभूमि बताता है, बल्कि यह जीवन में आने वाली मानसिक चुनौतियों और विकल्पों की स्थिति को भी दर्शाता है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि जब हम कर्तव्य और भावना के बीच उलझते हैं, तब आत्मिक मार्गदर्शन कितना आवश्यक होता है।
🔹 अध्याय का उद्देश्य:
श्रीमद्भगवद्गीता का यह पहला अध्याय हमें यह बताता है कि केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि भीतर के द्वंद्व से भी लड़ना पड़ता है। यह अध्याय श्रीकृष्ण की शिक्षाओं की भूमिका तैयार करता है।