📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
📝 श्लोक 26 – शीर्षक: अर्जुन का युद्धभूमि में अपने स्वजनों को देखना
🔸 संस्कृत श्लोक:
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा |
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥
🔹 हिंदी में अर्थ:
पार्थ (अर्जुन) ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने पिता, पितामह, आचार्य (गुरुजन), मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, श्वसुर और शुभचिंतकों को देखा।
🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):
जब अर्जुन ने दोनों ओर खड़े हुए अपने अपने कुटुंबजनों, गुरुजनों और आत्मीय लोगों को देखा, तो उसके मन में गहरी करुणा और द्वंद्व उत्पन्न होने लगा। युद्ध अब उसके लिए केवल धर्म का नहीं, रिश्तों और भावनाओं का प्रश्न बन गया।
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