📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
🔸 श्लोक 5 (संस्कृत श्लोक):
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
🔹 हिंदी में अर्थ:
हे मधुसूदन! मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, भले ही ये मुझे मारना चाहें। चाहे तीनों लोकों का राज्य भी मुझे क्यों न मिल जाए, तो भी मैं पृथ्वी के राज्य के लिए इनको क्यों मारूँ?
🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):
अर्जुन कहता है कि युद्ध करने से अगर मुझे संपूर्ण पृथ्वी या तीनों लोकों का राज्य भी मिले, फिर भी मैं अपने स्वजनों की हत्या नहीं करना चाहता। वह मोह और करुणा में इतना डूब चुका है कि उसे धर्म और कर्तव्य का बोध नहीं रह गया। यह श्लोक उसकी मानसिक स्थिति और द्वंद्व को दर्शाता है।