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श्रीमद्भगवद्गीता
📚..ज्ञान, योग और मोक्ष का दिव्य मार्ग..📚

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 30 – शीर्षक: अर्जुन का युद्ध से पीछे हटने की भावना

🔸 संस्कृत श्लोक:

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हे केशव! मैं खड़ा नहीं रह पा रहा, मेरा मन चक्कर खा रहा है,
और मैं केवल अपशकुन ही देख रहा हूँ।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

अर्जुन की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई है।
उसका शरीर काँप रहा है, मन भ्रमित हो गया है,
और वह हर ओर से अशुभ संकेतों को महसूस कर रहा है।
वह युद्ध से हटने की ओर झुक रहा है।

© Bipin Kumar Chaurasiya द्वारा निर्मित | यह सामग्री सार्वजनिक उपयोग हेतु है – धर्म प्रचार में निःसंकोच उपयोग करें।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 26 – शीर्षक: अर्जुन का युद्धभूमि में अपने स्वजनों को देखना

🔸 संस्कृत श्लोक:

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा |
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

पार्थ (अर्जुन) ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने पिता, पितामह, आचार्य (गुरुजन), मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, श्वसुर और शुभचिंतकों को देखा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

जब अर्जुन ने दोनों ओर खड़े हुए अपने अपने कुटुंबजनों, गुरुजनों और आत्मीय लोगों को देखा, तो उसके मन में गहरी करुणा और द्वंद्व उत्पन्न होने लगा। युद्ध अब उसके लिए केवल धर्म का नहीं, रिश्तों और भावनाओं का प्रश्न बन गया।

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📝 श्लोक 15 – शीर्षक: पांडवों द्वारा दिव्य शंखनाद

🔸 संस्कृत श्लोक:

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः |
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख, धनंजय (अर्जुन) ने ‘देवदत्त’ नामक शंख, और भीमसेन ने ‘पौण्ड्र’ नामक विशाल शंख बजाया।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में पांडव पक्ष के प्रमुख योद्धाओं द्वारा अपने-अपने शंख बजाने का वर्णन है। श्रीकृष्ण, जो रथ के सारथी हैं, ‘पाञ्चजन्य’ शंख बजाते हैं। अर्जुन, जो धनुर्विद्या में निपुण हैं, ‘देवदत्त’ शंख बजाते हैं। और बलवान भीम, जिन्हें ‘वृकोदर’ कहा गया है, ‘पौण्ड्र’ नामक महाशंख बजाते हैं। यह शंखनाद पांडवों की वीरता और आत्मबल का प्रतीक है।

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📝 श्लोक 14 – शीर्षक: पांडवों के शंखनाद द्वारा वीरता का उद्घोष

🔸 संस्कृत श्लोक:

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ |
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

फिर, सफेद घोड़ों से जुते हुए एक भव्य रथ में स्थित
माधव (भगवान श्रीकृष्ण) और पाण्डव (अर्जुन) ने
अपने-अपने दिव्य शंखों को बजाया।


🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह दृश्य युद्ध भूमि का है। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन एक दिव्य रथ पर खड़े हैं, जिसे श्वेत (सफेद) घोड़े खींच रहे हैं — यह शुद्धता और विजय का प्रतीक है। युद्ध की गंभीरता को दर्शाते हुए, दोनों ने अपने अलौकिक शंख बजाए।

शंखनाद केवल युद्ध की शुरुआत नहीं था, बल्कि यह धर्म की घोषणा थी। यह संकेत था कि अब न्याय के लिए, धर्म की रक्षा के लिए युद्ध आरंभ होगा। श्रीकृष्ण स्वयं सारथी हैं — जो दर्शाता है कि जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है, तो ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शन करते हैं। 

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📝 श्लोक 13 – शीर्षक: कौरव सेना में शंख, नगाड़े, भेरी और आनक का नाद

🔸 संस्कृत श्लोक:

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

इसके बाद शंख, भेरी, नगाड़े, आनक और गोमुख — ये सभी एक साथ जोर-जोर से बजने लगे, जिससे अत्यंत भयानक शब्द हुआ।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में कौरव पक्ष की सेना में उठे युद्धघोष का वर्णन किया गया है। शंख, भेरी, ढोल, नगाड़े, गोमुख आदि सभी वाद्य एक साथ बज उठे। यह सब युद्ध की तैयारी और उत्साह का प्रतीक था। इससे सम्पूर्ण युद्धभूमि भय और गर्जना से भर गया।

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📝 श्लोक 12 – शीर्षक: भीष्म पितामह द्वारा शंखनाद से युद्ध का उद्घोष

🔸 संस्कृत श्लोक:

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः |
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

कुरुवंश के वृद्ध और पराक्रमी पितामह भीष्म ने, दुर्योधन को उत्साहित करने के लिए सिंह के समान गर्जना की और अत्यंत बल से शंख बजाया।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह श्लोक बताता है कि भीष्म पितामह ने युद्ध आरंभ होने से पहले अपने शंख की गर्जना से पूरे युद्धक्षेत्र में उत्साह भर दिया। उन्होंने दुर्योधन को बल देने और कौरवों को जोश में लाने हेतु ऊँचे स्वर में सिंहनाद किया और शंखनाद के साथ युद्ध आरंभ की घोषणा की।

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📝 श्लोक 11 – शीर्षक: कौरवों को एकजुट होने का आदेश

🔸 संस्कृत श्लोक:

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः |
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

आप लोग अपनी-अपनी युद्ध की स्थितियों पर डटे रहें और सब ओर से पितामह भीष्म की रक्षा करें।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन अपनी सेना के सैनिकों और योद्धाओं से कहता है कि वे सभी रणनीतिक स्थानों पर डटे रहें और पितामह भीष्म की रक्षा करें। क्योंकि वह जानता है कि भीष्म ही उसकी सेना का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। यह आदेश कौरवों को संगठित और एकजुट बनाए रखने के लिए है।

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