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श्रीमद्भगवद्गीता
📚..ज्ञान, योग और मोक्ष का दिव्य मार्ग..📚

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 30 – शीर्षक: अर्जुन का युद्ध से पीछे हटने की भावना

🔸 संस्कृत श्लोक:

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हे केशव! मैं खड़ा नहीं रह पा रहा, मेरा मन चक्कर खा रहा है,
और मैं केवल अपशकुन ही देख रहा हूँ।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

अर्जुन की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई है।
उसका शरीर काँप रहा है, मन भ्रमित हो गया है,
और वह हर ओर से अशुभ संकेतों को महसूस कर रहा है।
वह युद्ध से हटने की ओर झुक रहा है।

© Bipin Kumar Chaurasiya द्वारा निर्मित | यह सामग्री सार्वजनिक उपयोग हेतु है – धर्म प्रचार में निःसंकोच उपयोग करें।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 26 – शीर्षक: अर्जुन का युद्धभूमि में अपने स्वजनों को देखना

🔸 संस्कृत श्लोक:

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा |
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

पार्थ (अर्जुन) ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने पिता, पितामह, आचार्य (गुरुजन), मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, श्वसुर और शुभचिंतकों को देखा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

जब अर्जुन ने दोनों ओर खड़े हुए अपने अपने कुटुंबजनों, गुरुजनों और आत्मीय लोगों को देखा, तो उसके मन में गहरी करुणा और द्वंद्व उत्पन्न होने लगा। युद्ध अब उसके लिए केवल धर्म का नहीं, रिश्तों और भावनाओं का प्रश्न बन गया।

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📝 श्लोक 15 – शीर्षक: पांडवों द्वारा दिव्य शंखनाद

🔸 संस्कृत श्लोक:

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः |
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख, धनंजय (अर्जुन) ने ‘देवदत्त’ नामक शंख, और भीमसेन ने ‘पौण्ड्र’ नामक विशाल शंख बजाया।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में पांडव पक्ष के प्रमुख योद्धाओं द्वारा अपने-अपने शंख बजाने का वर्णन है। श्रीकृष्ण, जो रथ के सारथी हैं, ‘पाञ्चजन्य’ शंख बजाते हैं। अर्जुन, जो धनुर्विद्या में निपुण हैं, ‘देवदत्त’ शंख बजाते हैं। और बलवान भीम, जिन्हें ‘वृकोदर’ कहा गया है, ‘पौण्ड्र’ नामक महाशंख बजाते हैं। यह शंखनाद पांडवों की वीरता और आत्मबल का प्रतीक है।

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📝 श्लोक 14 – शीर्षक: पांडवों के शंखनाद द्वारा वीरता का उद्घोष

🔸 संस्कृत श्लोक:

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ |
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

फिर, सफेद घोड़ों से जुते हुए एक भव्य रथ में स्थित
माधव (भगवान श्रीकृष्ण) और पाण्डव (अर्जुन) ने
अपने-अपने दिव्य शंखों को बजाया।


🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह दृश्य युद्ध भूमि का है। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन एक दिव्य रथ पर खड़े हैं, जिसे श्वेत (सफेद) घोड़े खींच रहे हैं — यह शुद्धता और विजय का प्रतीक है। युद्ध की गंभीरता को दर्शाते हुए, दोनों ने अपने अलौकिक शंख बजाए।

शंखनाद केवल युद्ध की शुरुआत नहीं था, बल्कि यह धर्म की घोषणा थी। यह संकेत था कि अब न्याय के लिए, धर्म की रक्षा के लिए युद्ध आरंभ होगा। श्रीकृष्ण स्वयं सारथी हैं — जो दर्शाता है कि जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है, तो ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शन करते हैं। 

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 13 – शीर्षक: कौरव सेना में शंख, नगाड़े, भेरी और आनक का नाद

🔸 संस्कृत श्लोक:

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

इसके बाद शंख, भेरी, नगाड़े, आनक और गोमुख — ये सभी एक साथ जोर-जोर से बजने लगे, जिससे अत्यंत भयानक शब्द हुआ।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में कौरव पक्ष की सेना में उठे युद्धघोष का वर्णन किया गया है। शंख, भेरी, ढोल, नगाड़े, गोमुख आदि सभी वाद्य एक साथ बज उठे। यह सब युद्ध की तैयारी और उत्साह का प्रतीक था। इससे सम्पूर्ण युद्धभूमि भय और गर्जना से भर गया।

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📝 श्लोक 12 – शीर्षक: भीष्म पितामह द्वारा शंखनाद से युद्ध का उद्घोष

🔸 संस्कृत श्लोक:

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः |
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

कुरुवंश के वृद्ध और पराक्रमी पितामह भीष्म ने, दुर्योधन को उत्साहित करने के लिए सिंह के समान गर्जना की और अत्यंत बल से शंख बजाया।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह श्लोक बताता है कि भीष्म पितामह ने युद्ध आरंभ होने से पहले अपने शंख की गर्जना से पूरे युद्धक्षेत्र में उत्साह भर दिया। उन्होंने दुर्योधन को बल देने और कौरवों को जोश में लाने हेतु ऊँचे स्वर में सिंहनाद किया और शंखनाद के साथ युद्ध आरंभ की घोषणा की।

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📝 श्लोक 11 – शीर्षक: कौरवों को एकजुट होने का आदेश

🔸 संस्कृत श्लोक:

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः |
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

आप लोग अपनी-अपनी युद्ध की स्थितियों पर डटे रहें और सब ओर से पितामह भीष्म की रक्षा करें।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन अपनी सेना के सैनिकों और योद्धाओं से कहता है कि वे सभी रणनीतिक स्थानों पर डटे रहें और पितामह भीष्म की रक्षा करें। क्योंकि वह जानता है कि भीष्म ही उसकी सेना का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। यह आदेश कौरवों को संगठित और एकजुट बनाए रखने के लिए है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 10 – शीर्षक: पांडवों की सेना से तुलना करते हुए कौरव सेना का गौरव

🔸 संस्कृत श्लोक:

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् |
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हमारी सेना, जिसकी रक्षा भीष्म कर रहे हैं, असीमित है, और उनकी सेना, जिसकी रक्षा भीम कर रहे हैं, सीमित प्रतीत होती है।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन अपनी सेना की शक्ति का गर्वपूर्वक वर्णन करता है। वह कहता है कि हमारी सेना की रक्षा स्वयं भीष्म जैसे महायोद्धा कर रहे हैं, जिससे यह असीम बलशाली है। जबकि पांडवों की सेना की रक्षा केवल भीम कर रहे हैं, जो सीमित शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह तुलना दुर्योधन के मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास को दर्शाती है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 9 – शीर्षक: कौरवों की अपार सेना और अन्य वीर योद्धा

🔸 संस्कृत श्लोक:

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः |
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

और भी बहुत से शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हैं। वे अनेक प्रकार के शस्त्र-प्रयोग में कुशल तथा युद्ध में निपुण हैं।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 8 – शीर्षक: कौरवों की ओर से महान योद्धाओं का वर्णन – भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य

🔸 संस्कृत श्लोक:

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

(आप) स्वयं, भीष्म, कर्ण और समर में विजयी कृपाचार्य; अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र — ये सभी प्रमुख योद्धा हैं।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन कौरव पक्ष की सेना के अद्वितीय योद्धाओं की सूची गिनाता है। वह गुरु द्रोण को भी इस सूची में सम्मिलित करता है, जो उसके लिए सम्मान और अपनी सेना के बल को दर्शाता है। यह श्लोक दर्शाता है कि कौरव पक्ष में भी परम शक्तिशाली योद्धा हैं जो युद्ध में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 7 – शीर्षक: कौरव पक्ष की सेना का बल – भीष्म द्वारा रक्षित

🔸 संस्कृत श्लोक:

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ (द्रोणाचार्य)! अब हमारी सेना के उन प्रमुख योद्धाओं को जानिए जिनका मैं आपके लिए नाम ले रहा हूँ — जो इस सेना का नेतृत्व कर रहे हैं।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन अपनी सेना के प्रमुख नायकों का वर्णन शुरू करता है। वह गुरु द्रोण से कहता है कि वे ध्यान दें कि मेरी सेना में कौन-कौन से वीर योद्धा हैं, ताकि वे उनकी शक्ति को जान सकें। यह युद्ध की रणनीति और आत्मविश्वास को दर्शाता है।

📖 अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग – सभी 47 श्लोक की सूची

🔸 श्लोक संख्या 🔗 श्लोक शीर्षक (लिंक)
1श्लोक 1 – 📝 शीर्षक: (धृतराष्ट्र का युद्धभूमि में प्रश्न)
2श्लोक 2 – 📝 शीर्षक: दुर्योधन की प्रतिक्रिया – पांडवों की सेना को देखकर गुरु द्रोण से संवाद
3श्लोक 3 – 📝 शीर्षक: दुर्योधन द्वारा पांडवों की सेना की विशेषताओं का वर्णन
4श्लोक 4 – 📝 शीर्षक: पांडवों की सेना के प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख
5श्लोक 5 – 📝 शीर्षक: अन्य महारथियों का परिचय — पांडव पक्ष के महान योद्धा
6श्लोक 6 – 📝 शीर्षक: द्रौपदी-पुत्र और अभिमन्यु जैसे वीर योद्धाओं का उल्लेख
7श्लोक 7 – 📝 शीर्षक: कौरव पक्ष की सेना का बल – भीष्म द्वारा रक्षित
8श्लोक 8 – 📝 शीर्षक: कौरवों की ओर से महान योद्धाओं का वर्णन – भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य
9श्लोक 9 – 📝 शीर्षक: कौरवों की अपार सेना और अन्य वीर योद्धा
10श्लोक 10 – 📝 शीर्षक: पांडवों की सेना से तुलना करते हुए कौरव सेना का गौरव
11श्लोक 11 – 📝 शीर्षक: कौरवों को एकजुट होने का आदेश
12श्लोक 12 – 📝 शीर्षक: भीष्म पितामह द्वारा शंखनाद से युद्ध का उद्घोष
13श्लोक 13 – 📝 शीर्षक: कौरव सेना में शंख, नगाड़े, भेरी और आनक का नाद
14श्लोक 14 – 📝 शीर्षक "धर्म युद्ध की उद्घोषणा"
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📝 श्लोक 6 – शीर्षक: द्रौपदी-पुत्र और अभिमन्यु जैसे वीर योद्धाओं का उल्लेख

🔸 संस्कृत श्लोक:

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् |
सौभद्रः द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

युधामन्यु, बलशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्र — ये सभी महारथी हैं।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन पांडवों की सेना में उपस्थित युवा लेकिन पराक्रमी योद्धाओं का भी उल्लेख करता है। अभिमन्यु (सुभद्रा और अर्जुन का पुत्र) और द्रौपदी के पांचों पुत्र, साथ ही युधामन्यु व उत्तमौजा — ये सभी महारथी हैं जो युद्ध में उत्कृष्ट कौशल वाले हैं। यह बताता है कि पांडव पक्ष केवल वृद्ध या अनुभवी ही नहीं, बल्कि युवा और शक्तिशाली योद्धाओं से भी सुसज्जित है।

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📝 श्लोक 5 – शीर्षक: अन्य महारथियों का परिचय — पांडव पक्ष के महान योद्धा

🔸 संस्कृत श्लोक:

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् |
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

इस सेना में धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशी नरेश, पुरुजित, कुन्तिभोज और श्रेष्ठ पुरुष शैब्य भी विद्यमान हैं।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन पांडव पक्ष की विशाल और पराक्रमी सेना का वर्णन करते हुए उन प्रमुख राजाओं और योद्धाओं के नाम लेता है जो पांडवों की ओर से युद्ध में भाग ले रहे हैं। इससे उसकी मानसिक स्थिति में उद्वेग और रणनीतिक चिंता की झलक मिलती है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 4 – शीर्षक: पांडवों की सेना के प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख

🔸 संस्कृत श्लोक:

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि |
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

इस सेना में अनेक महान धनुर्धारी और शूरवीर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान बलशाली हैं— जैसे युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन पांडवों की सेना में उपस्थित पराक्रमी योद्धाओं की प्रशंसा करता है। वह कहता है कि वहाँ भीम और अर्जुन जैसे महान योद्धाओं के समकक्ष युयुधान (सात्यकि), विराट और राजा द्रुपद जैसे महारथी भी हैं। इससे उसकी चिंता और सावधानी झलकती है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 3 – शीर्षक: दुर्योधन द्वारा पांडवों की सेना की विशेषताओं का वर्णन

🔸 संस्कृत श्लोक:

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् |
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हे आचार्य! देखिए, पांडुपुत्रों की यह विशाल सेना, जो आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा सुव्यवस्थित रूप से सजाई गई है।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

दुर्योधन, गुरु द्रोणाचार्य से कहता है कि पांडवों की सेना बहुत विशाल है और इसे आपके ही शिष्य धृष्टद्युम्न ने व्यवस्थित किया है। यह बात वह उन्हें ताना मारते हुए कहता है, यह संकेत देने के लिए कि आपने जिसे शस्त्र विद्या सिखाई, वह आज हमारे विरुद्ध युद्ध कर रहा है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

📝 श्लोक 2 – शीर्षक: दुर्योधन की प्रतिक्रिया – पांडवों की सेना को देखकर गुरु द्रोण से संवाद

🔸 संस्कृत श्लोक:

सञ्जय उवाच:
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा |
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

संजय बोले: उस समय जब राजा दुर्योधन ने पांडवों की सेना को युद्ध के लिए व्यवस्थित (संगठित) रूप में खड़ा देखा, तब वह अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहने लगा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह श्लोक युद्ध आरंभ से पहले की स्थिति को दर्शाता है। पांडवों की रणनीतिक, शक्तिशाली सेना देखकर दुर्योधन चिंतित हो उठता है और अपने सेनापति गुरु द्रोण के पास जाकर संवाद करता है। यह संवाद आगे की नीति और मनोस्थिति को दर्शाने वाला है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 1 (संस्कृत श्लोक):

धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

धृतराष्ट्र बोले: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र होकर, युद्ध की इच्छा रखने वाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में अंधे राजा धृतराष्ट्र युद्धभूमि में उपस्थित नहीं होने के कारण अपने मंत्री संजय से पूछते हैं कि जब कुरुक्षेत्र में दोनों पक्ष युद्ध के लिए तैयार हुए, तो उन्होंने क्या किया। "धर्मक्षेत्र" शब्द यह दर्शाता है कि यह केवल भौतिक युद्ध नहीं है, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच आत्मिक संघर्ष भी है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔹 अध्याय 1 का परिचय:

श्रीमद्भगवद्गीता का पहला अध्याय "अर्जुन विषाद योग" कहलाता है। यह अध्याय कुरुक्षेत्र युद्ध के आरंभिक दृश्य को प्रस्तुत करता है, जहाँ अर्जुन युद्धभूमि में अपने रिश्तेदारों, गुरुओं और मित्रों को सामने खड़ा देख कर मानसिक रूप से विचलित हो जाता है।

🔹 अध्याय 1 में कुल श्लोक:

इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं।

🔹 इस अध्याय में क्या होता है?

  • धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि युद्धभूमि में उनके और पांडवों के पुत्रों ने क्या किया।
  • संजय बताता है कि दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार हैं और सेनानायकों के नाम गिनवाता है।
  • शंखनाद द्वारा युद्ध की शुरुआत होती है।
  • अर्जुन श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने को कहता है।
  • अर्जुन अपने परिजनों को देखकर भावुक हो जाता है और युद्ध करने से पीछे हटने लगता है।
  • वह अपना गांडीव (धनुष) नीचे रखकर बैठ जाता है और युद्ध से इंकार कर देता है।

🔹 अध्याय 1 का सार (भावार्थ):

यह अध्याय मनुष्य की मानसिक पीड़ा, मोह और कर्तव्य के द्वंद्व को दर्शाता है। अर्जुन का विषाद (दुःख) दर्शाता है कि जब जीवन में कठिन निर्णय आते हैं, तो केवल बाह्य शक्ति नहीं, अपितु आत्मिक संतुलन और सही ज्ञान भी आवश्यक होता है। इस स्थिति में श्रीकृष्ण मार्गदर्शक रूप में आगे आते हैं।

🔹 यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

अर्जुन विषाद योग न केवल युद्धभूमि की पृष्ठभूमि बताता है, बल्कि यह जीवन में आने वाली मानसिक चुनौतियों और विकल्पों की स्थिति को भी दर्शाता है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि जब हम कर्तव्य और भावना के बीच उलझते हैं, तब आत्मिक मार्गदर्शन कितना आवश्यक होता है।

🔹 अध्याय का उद्देश्य:

श्रीमद्भगवद्गीता का यह पहला अध्याय हमें यह बताता है कि केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि भीतर के द्वंद्व से भी लड़ना पड़ता है। यह अध्याय श्रीकृष्ण की शिक्षाओं की भूमिका तैयार करता है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 6 (संस्कृत श्लोक):

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च |
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख की इच्छा करते हैं, वे ही लोग यहाँ युद्धभूमि में अपने प्राण और धन त्यागने के लिए तैयार खड़े हैं।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

अर्जुन कहता है कि युद्ध का उद्देश्य राज्य और सुख है — लेकिन जिन लोगों के साथ वह ये सुख बांटना चाहता था, वे ही आज युद्धभूमि में उसके विरोध में खड़े हैं। ऐसे में यह युद्ध व्यर्थ और दुखद प्रतीत होता है। यह अर्जुन के मानसिक द्वंद्व को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 5 (संस्कृत श्लोक):

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

हे मधुसूदन! मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, भले ही ये मुझे मारना चाहें। चाहे तीनों लोकों का राज्य भी मुझे क्यों न मिल जाए, तो भी मैं पृथ्वी के राज्य के लिए इनको क्यों मारूँ?

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

अर्जुन कहता है कि युद्ध करने से अगर मुझे संपूर्ण पृथ्वी या तीनों लोकों का राज्य भी मिले, फिर भी मैं अपने स्वजनों की हत्या नहीं करना चाहता। वह मोह और करुणा में इतना डूब चुका है कि उसे धर्म और कर्तव्य का बोध नहीं रह गया। यह श्लोक उसकी मानसिक स्थिति और द्वंद्व को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 4 (संस्कृत श्लोक):

अपश्यतं तदा पार्थः पितृ़नथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

तब अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने पिता, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, श्वसुर और शुभचिंतकों को देखा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

इस श्लोक में वर्णन है कि अर्जुन ने जब युद्धभूमि में अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को दोनों पक्षों की सेनाओं में देखा, तो वह मानसिक रूप से विचलित हो गया। वह युद्ध से पहले भावुक हो उठा क्योंकि जिन्हें वह अपना समझता था, वे सब सामने युद्ध के लिए तैयार खड़े थे।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 3 (संस्कृत श्लोक):

तं तथा कृपयाविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
विषीदन्तम् इदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

उस समय जब अर्जुन करुणा से व्याकुल हो गया,
उसकी आँखें आँसुओं से भर गईं और उसका मन अत्यंत दुःखी हो गया,
तब मधुसूदन (भगवान श्रीकृष्ण) ने उससे यह वचन कहा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह श्लोक बताता है कि अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर करुणा से भर गया था।
उसके मन में युद्ध करने की इच्छा समाप्त हो गई थी।
वह विषाद में डूबा हुआ था और उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता थी।
तब श्रीकृष्ण ने उसे धर्म का ज्ञान देना प्रारंभ किया।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग

🔸 श्लोक 2 (संस्कृत श्लोक):

श्रीभगवानुवाच:
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

भगवान श्रीकृष्ण बोले:
हे अर्जुन! यह मोह तुझ पर इस कठिन समय में कैसे छा गया?
यह न तो आर्य पुरुषों को शोभा देता है, न स्वर्ग दिलाने वाला है,
और न ही यश की प्राप्ति कराने वाला है।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

श्रीकृष्ण अर्जुन को झकझोरते हुए पूछते हैं कि यह दुर्बलता और मोह की भावना युद्ध जैसे धर्म के क्षण में क्यों आई? यह जो तू करुणा के कारण युद्ध से भागना चाहता है, वह आचरण आर्य पुरुषों (श्रेष्ठ जनों) का नहीं होता। यह न तो पुण्य है, न सम्मानजनक। बल्कि यह तुझे अपकीर्ति और अधर्म की ओर ले जाएगा।

📖 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग


🔸 श्लोक 1 (संस्कृत श्लोक):

सञ्जय उवाच:
तं तथा कृपयाविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
विषीदन्तम् इदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥

🔹 हिंदी में अर्थ:

संजय बोले: उस समय जब अर्जुन करुणा से व्याकुल हो गया,
उसकी आँखें आँसुओं से भर गईं, और उसका मन अत्यंत उदास था —
तब मधुसूदन (भगवान श्रीकृष्ण) ने उससे यह वचन कहा।

🪔 भावार्थ (सरल व्याख्या):

यह श्लोक बताता है कि अर्जुन का मन युद्ध की स्थिति देखकर द्रवित हो गया था। वह अपने स्वजनों को देखकर मोह और करुणा में पड़ गया। उसकी आँखों में आँसू थे और वह गहरे दुःख में था। तभी भगवान श्रीकृष्ण उसे सही मार्ग दिखाने के लिए बोलना आरंभ करते हैं।